पतंग2

Category : रचनाकार1
Author : Munender

तीन तिरछी पट्टियों वाली पतंग

मई की शाम के आकाश में

ऊपर जामुनी

बीच में वसंती

और नीचे आसमान के दीप्तिमान नीले में

जादुई फ़िरोज़ी

अंतरिक्ष के अक्षांशों को बदलती

वायु के आघूर्ण

और बरनूली की प्रमेय पर सवार

हिचकोले खा के नाव-सी उतरती है वर्तमान में

जैसे उतरता हो आकाशदीप

क्षितिज की कोमल और अँधेरी रेखाओं में

अचानक घास हवा और ज़मीन से

निकलते हैं बच्चे

वीर-विहीन धरती पर कुछ होने की शुभाशंका की तरह

बेस्वाद घरों की आकृतियों को अपनी लग्गियों से जगाते

सर्र से निकल जाते है सूरज के सामने से

तेज़ भागती गाड़ियों और टेनिस खेलकर लौटती औरतों के सामने से

उड़नतश्तरी अटक जाती है टेलीफ़ोन के तार में

अपने हाथ ऊपर उठाते हैं

डोर से बँधे सूफ़ी

और यह उतरा हंस

उच्छल जलधि में

छूते ही टूट जाता है शिव का धनुष

टंकार से काँपती हैं दसों दिशाएँ

बोलती बंद सन्निपात और हड़कंप

फिर सब सहज

मुक्त होकर निश्छल लौटते हैं

एक दूसरे को चपतियाते

छोटी-छोटी बातों पर हँस-हँसकर लोटपोट होते

ये शिव-धनु-भंजक मानव के रणंजय

एटलांटिक और प्रशांत को जोड़ने वाले पाँव

उधर कहीं समेटी जा रही है बाक़ी बची डोर

अगली यात्रा के लिए तौले जा रहे हैं जहाज़

तेज़ी से काम कर रही हैं अभियान की सूरतें

कभी न हारने वाली आशाएँ

उत्तरी ध्रुव एंटार्कटिका सगरमाथा को छूने वाली उंगलियाँ

इधर सूरज हो गया दार्शनिक अरुणाभ

शिव के आशीर्वाद की तरह

और यह देखो फिर एक हरी पतंग ने

गाँठ की तरह जोड़ दिया हमारी डोर को

सूर्य के जाते हुए रथ से

लोकातीत सूत्रों तक।

पतंग2

Category : रचनाकार1
Author : Munender

तीन तिरछी पट्टियों वाली पतंग

मई की शाम के आकाश में

ऊपर जामुनी

बीच में वसंती

और नीचे आसमान के दीप्तिमान नीले में

जादुई फ़िरोज़ी

अंतरिक्ष के अक्षांशों को बदलती

वायु के आघूर्ण

और बरनूली की प्रमेय पर सवार

हिचकोले खा के नाव-सी उतरती है वर्तमान में

जैसे उतरता हो आकाशदीप

क्षितिज की कोमल और अँधेरी रेखाओं में

अचानक घास हवा और ज़मीन से

निकलते हैं बच्चे

वीर-विहीन धरती पर कुछ होने की शुभाशंका की तरह

बेस्वाद घरों की आकृतियों को अपनी लग्गियों से जगाते

सर्र से निकल जाते है सूरज के सामने से

तेज़ भागती गाड़ियों और टेनिस खेलकर लौटती औरतों के सामने से

उड़नतश्तरी अटक जाती है टेलीफ़ोन के तार में

अपने हाथ ऊपर उठाते हैं

डोर से बँधे सूफ़ी

और यह उतरा हंस

उच्छल जलधि में

छूते ही टूट जाता है शिव का धनुष

टंकार से काँपती हैं दसों दिशाएँ

बोलती बंद सन्निपात और हड़कंप

फिर सब सहज

मुक्त होकर निश्छल लौटते हैं

एक दूसरे को चपतियाते

छोटी-छोटी बातों पर हँस-हँसकर लोटपोट होते

ये शिव-धनु-भंजक मानव के रणंजय

एटलांटिक और प्रशांत को जोड़ने वाले पाँव

उधर कहीं समेटी जा रही है बाक़ी बची डोर

अगली यात्रा के लिए तौले जा रहे हैं जहाज़

तेज़ी से काम कर रही हैं अभियान की सूरतें

कभी न हारने वाली आशाएँ

उत्तरी ध्रुव एंटार्कटिका सगरमाथा को छूने वाली उंगलियाँ

इधर सूरज हो गया दार्शनिक अरुणाभ

शिव के आशीर्वाद की तरह

और यह देखो फिर एक हरी पतंग ने

गाँठ की तरह जोड़ दिया हमारी डोर को

सूर्य के जाते हुए रथ से

लोकातीत सूत्रों तक।

पतंग2

Category : रचनाकार1
Author : Munender

तीन तिरछी पट्टियों वाली पतंग

मई की शाम के आकाश में

ऊपर जामुनी

बीच में वसंती

और नीचे आसमान के दीप्तिमान नीले में

जादुई फ़िरोज़ी

अंतरिक्ष के अक्षांशों को बदलती

वायु के आघूर्ण

और बरनूली की प्रमेय पर सवार

हिचकोले खा के नाव-सी उतरती है वर्तमान में

जैसे उतरता हो आकाशदीप

क्षितिज की कोमल और अँधेरी रेखाओं में

अचानक घास हवा और ज़मीन से

निकलते हैं बच्चे

वीर-विहीन धरती पर कुछ होने की शुभाशंका की तरह

बेस्वाद घरों की आकृतियों को अपनी लग्गियों से जगाते

सर्र से निकल जाते है सूरज के सामने से

तेज़ भागती गाड़ियों और टेनिस खेलकर लौटती औरतों के सामने से

उड़नतश्तरी अटक जाती है टेलीफ़ोन के तार में

अपने हाथ ऊपर उठाते हैं

डोर से बँधे सूफ़ी

और यह उतरा हंस

उच्छल जलधि में

छूते ही टूट जाता है शिव का धनुष

टंकार से काँपती हैं दसों दिशाएँ

बोलती बंद सन्निपात और हड़कंप

फिर सब सहज

मुक्त होकर निश्छल लौटते हैं

एक दूसरे को चपतियाते

छोटी-छोटी बातों पर हँस-हँसकर लोटपोट होते

ये शिव-धनु-भंजक मानव के रणंजय

एटलांटिक और प्रशांत को जोड़ने वाले पाँव

उधर कहीं समेटी जा रही है बाक़ी बची डोर

अगली यात्रा के लिए तौले जा रहे हैं जहाज़

तेज़ी से काम कर रही हैं अभियान की सूरतें

कभी न हारने वाली आशाएँ

उत्तरी ध्रुव एंटार्कटिका सगरमाथा को छूने वाली उंगलियाँ

इधर सूरज हो गया दार्शनिक अरुणाभ

शिव के आशीर्वाद की तरह

और यह देखो फिर एक हरी पतंग ने

गाँठ की तरह जोड़ दिया हमारी डोर को

सूर्य के जाते हुए रथ से

लोकातीत सूत्रों तक।

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